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धर्म का स्मरण!

Date Written: September 3, 2017
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कभी-कभी मेरी निद्रा को एक विचार भंग कर जाता है 
हां,मेरे जेहन में भी धर्म का ख्याल आ जाता है।

अज्ञानता के बंधक,लाचार,विवश भक्तों का ख्याल 
अक्सर मेरे हृदय को झंझोर जाता है।

धर्म का प्रलाप करते हैं,स्वयं को ज्ञानी कहते हैं 
उन राम-रहीम और आशाराम का स्मरण हो आता है।

प्राय एक घटना का ख्याल आ जाता है 
मंदिर के द्वार पर बैठा दरिद्र,लाचार भिखारी 
उसकी रिक्त झोली देख ,
मंदिर का दानपात्र कंटक सा चुबता जाता है।

शिव की मूरत मात्र पर दूध की नदियां बहते हैं 
पर उसी मूरत के बगल में बेठे भूखे बालक को देख 
इन भक्तों की अज्ञानता पर तरस सा आ जाता है।

बेचारे नादान हैं गंगा-स्नान को आतुर रहते हैं 
पवित्रता की कामना करते हैं 
पर जनाब गंगा तो बस बाहरी मैल मात्र को धो सकती है 
उनके अंतर-मन की अज्ञानता तो अब भी गंगाजल से अछूती है 
पर हुज़ूर गरीब को दान मात्र से हर पाप धूल जाता है।

खुद को कृष्ण भक्त कहते हैं 
पर उनके ही आदर्श इन्हे मिथ्या लगते हैं 
आडंबन को धर्म मान बैठे हैं,गीता को व्यर्थ समझते हैं
मानवता का तो पूर्ण त्याग ही कर बैठे हैं 
अक्सर ये छलावा मेरे हृदय में हास्य जगा जाता है।

राम लाला को मानते हैं,
मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर जानते हैं ,
पर विध्वंश की हर मर्यादा पार कर,उस परब्रह्म को ही बांटते हैं 
नित्त नए दंगो की ख़बरें सुन मेरा हृदय दहला जाता है।

हां,मैं नहीं कहता कि धर्म का तुम त्याग करो 
पर क्या आपका धर्म,वास्तव में धर्म है 
दंगे-फसाद,बंटवारा,जात-पात,मजहब,यदि यही आपका धर्म है 
क्षमा करे मान्यवर ,पर ये मानवता नहीं,पशुओं का चरित्र है 
यदा यदा इस चरित्र को देख मन कंपकपा सा जाता है।

हाँ,आप मानिये अपने ईश्वर को,नानक को ,अपने अल्लाह को 
पर क्या उनका अनुचरण ही आपका धर्म नहीं 
मैं नहीं कहता,कहते खुद आपके द्वारिकानाथ हैं 
मानवता ही है धर्म,हर मानव में ईश्वर विद्यमान हैं 
हिंसा-घृणा धर्म नहीं ,करुणा-प्रेम ही धर्म की पहचान हैं 
हैं साधुवाद के पात्र वो सज्जन,जो वास्तविक धर्म के जानकर हैं 
ऐसे साधुओं को देख हृदय शीतलता से भर आता है। 
ऐसे महापुरुषों को देख हृदय में प्रसन्नता का भाव उमड़ आता है।।

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by Abhishek Saini
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