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एक शख्श

Date Written: October 7, 2017
Categories:
 

एक शख्श रोज सपने में मेरे आता है

पता नहीं क्यों मेरे मन को इतना भाता है

करता है दिल से प्यार मुझे

एहसास यही हर बार  दिलाता है।

कितना भी देखना  चाहूँ उसे

पर चेहरा उसका धुँधला नज़र आता है

बहुत बार सोचूँ पूछना उससे ,कौन है वो?

मगर वह तो कुछ न कभी बोले

होंठो में ही मंद मंद मुस्काता है।

कभी वह खुद मेरे लिए रोए

कभी आँखें मेरी आंसुओं से भिगोता है।

दिन भर याद करना चाहूँ उसे

दिन चढ़ते सपना ही भूल जाता है।

न जाने क्या है खुदा की मर्जी

क्यों उसी से हर बार मिलाता  है।

मेरे लिए लड़ जाता है कभी सबसे

बातों से लोगों की मुझे बचाता है।

कभी कभी वही शख्श लेने मुझे घर से मेरे

फूलों से सजी गाडी में बारात ले आता है।

जो जो भी होती रस्में शादी में

बड़े दिल से उन्हें निभाता है।

इतने में हर बार वहीँ सपना टूट जाता है।

वह शख्श न जाने कहाँ ओझल हो जाता है।

 

 

2 comments on “एक शख्श”

  1. Subhashchandra B Adhav     October 7, 2017

    Wonderful dream—–It happens—–Descent floe—–Alluring words—-A well composed poem—-Well done!1

  2. Amandeep     October 7, 2017

    Thanku so much sir. Ur words r so precious for me

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