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दिल-ए -नादान

Date Written: October 12, 2017
Categories:
 

इस दिल-ए -नादान की बस तू ही आरज़ू है,

जैसा माँगा था साथी इस दिल ने  

तू उससे मिलता हु-ब -हु  है,

न मानता मेरा कहना बस तेरी 

मुस्कराहट की ही इसे ज़ुस्तज़ु है,

मैं तो तुझे देखना भी मुनासिब न समझूँ 

बस इस दिल के कारन  ही तू होता मेरे रु-ब -रु है,

 

4 comments on “दिल-ए -नादान”

  1. Sonia Crt     October 12, 2017

    lovely

    1. Amandeep     October 12, 2017

      Thnku sonia

  2. Uma Natarajan     October 12, 2017

    Achchi shayari hai

    1. Amandeep     October 12, 2017

      Thanku so much mam

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