है मशाल ज्योति का प्रतिक
अतीत से आज तक
मशाल ज्योति का प्रतिक
मनुष्य का प्रकृति पे विजय
विधाता ने खेले खेल
बनाया क्षिति, अग्नि, गगन, समीर व् जल
विधाता ने दिन बनायीं
और रत बनायीं
प्रकाश भी किया
और अंधकार भी बनायीं
और उस अंधकार में भटकने वाले
जंगली जानवरों के काफिले
जब हुआ मानव को भय
पुकारा अपने विधाता को
'तमसो मा ज्योतिर्मय'
विधाता ने खेला लुका-छिपी
तारों की झील-मिल चाँद की चमक
बिजली की लुका-छिपी
जुगनूँ की भुक-भुक
पुरुष हो पुरुषार्थ करो
यु जीवन को न व्यर्थ करो
जीत लो जग को
ले हाथ में मशाल को
चलो प्रगति के पथ पे
चुनौतीपूर्ण जीवन पथ पे
हो जीवन पथ के तुम पथिक
है मशाल ज्योति का प्रतिक
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'
मशाल ज्योति का प्रतिक
मनुष्य का प्रकृति पे विजय
विधाता ने खेले खेल
बनाया क्षिति, अग्नि, गगन, समीर व् जल
विधाता ने दिन बनायीं
और रत बनायीं
प्रकाश भी किया
और अंधकार भी बनायीं
और उस अंधकार में भटकने वाले
जंगली जानवरों के काफिले
जब हुआ मानव को भय
पुकारा अपने विधाता को
'तमसो मा ज्योतिर्मय'
विधाता ने खेला लुका-छिपी
तारों की झील-मिल चाँद की चमक
बिजली की लुका-छिपी
जुगनूँ की भुक-भुक
पुरुष हो पुरुषार्थ करो
यु जीवन को न व्यर्थ करो
जीत लो जग को
ले हाथ में मशाल को
चलो प्रगति के पथ पे
चुनौतीपूर्ण जीवन पथ पे
हो जीवन पथ के तुम पथिक
है मशाल ज्योति का प्रतिक
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'
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Good
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Poetry.com 4.5 out of 5 based on 6 votes.
but exotic alphabets
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Good
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Well I know you write nice poem and I love your style :)
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but its cool to look at (lol)
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![]() |
Try to make best out of life you have.Very nice words explaining the light of Chand sitare !
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i wish i could understand this poem,cuz i'm sure it's a great one!
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